उज्जैन 30 सितंबर।उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र अध्ययनशाला और भारतीय आर्थिक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में ‘खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कृषि अध्ययनशाला के सभागार में आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में देश भर से आए अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य केवल पेट भरने के लिए अनाज की उपलब्धता तक सीमित न रहकर, हर नागरिक तक पौष्टिक और संतुलित आहार की पहुंच सुनिश्चित करने पर मंथन करना था।कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रो. एस. महेंद्र देव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। वहीं, आईसीएफएआई विश्वविद्यालय, हैदराबाद के पूर्व कुलपति प्रो. कोटी रेड्डी विशिष्ट अतिथि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने की। इसके अलावा भारतीय आर्थिक संघ के मुख्य संयोजक अनिल कुमार ठाकुर सहित कई दिग्गज विद्वान उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि प्रो. एस. महेंद्र देव ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार का अब कृषि को लेकर नजरिया बदला है। अब केवल फसल के बंपर उत्पादन पर ही जोर नहीं दिया जा रहा, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने पर विशेष फोकस किया जा रहा है।उन्होंने खाद्य और पोषण सुरक्षा मजबूत करने के लिए उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती (विविधीकरण), फसल कटाई के बाद के प्रबंधन, बेहतर विपणन (मार्केटिंग) और एग्रो-प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण) उद्योगों को बढ़ावा देने की वकालत की।
कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने कृषि विकास, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मानव संसाधन के गहरे रिश्तों को रेखांकित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जोड़ते हुए कहा कि देश की मजबूत होती अर्थव्यवस्था के साथ यह जरूरी है कि कुपोषण मुक्त समाज का निर्माण किया जाए। उन्होंने कृषि विविधीकरण, जैविक खेती और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर बल दिया।कुलगुरु ने कहा कि जब तक देश का किसान आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होगा और हर बच्चे व नागरिक को थाली में संतुलित पोषण नहीं मिलेगा, तब तक ‘विकसित भारत-2047’ का संकल्प अधूरा रहेगा।
विचार-विमर्श की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए विशिष्ट अतिथि प्रो. कोटी रेड्डी ने भारत की ऐतिहासिक यात्रा का जिक्र किया। उन्होंने आजादी से पहले के बंगाल के अकाल की याद दिलाते हुए बताया कि किस तरह देश ने खाद्य संकट का सामना किया था। इसके बाद पंचवर्षीय योजनाओं, हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के जरिए देश ने खाद्यान्न और दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब सिर्फ पेट भरना काफी नहीं है, बल्कि देश को पोषण सुरक्षा की अगली बड़ी चुनौती से पार पाना होगा।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अर्थशास्त्र अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी संयोजक प्रो. एस.के. मिश्रा ने सभी अतिथियों का स्वागत और परिचय दिया।
कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार शर्मा ने सभी अतिथियों, विषय विशेषज्ञों और शोधार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में कृषि सुधारों, ग्रामीण विकास और सतत पोषण सुरक्षा को लेकर गहन मंथन जारी है।