श्योपुर जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के अंतर्गत संचालित स्वसहायता समूह ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक एवं सामाजिक बदलाव का माध्यम बन रहे हैं। कलेक्टर सुश्री शीला दाहिमा के मार्गदर्शन एवं सीईओ जिला पंचायत श्री कार्तिकेय जायसवाल के निर्देशन में स्वसहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं विभिन्न आजीविका मूलक गतिविधियों को अपनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। समूह से जुड़ने के बाद महिलाओं में बचत, ऋण एवं आर्थिक प्रबंधन की समझ विकसित होने के साथ ही परिवार के निर्णयों में उनकी भागीदारी भी बढ़ रही है।

विजयपुर तहसील के ग्राम धौरेरा निवासी श्रीमती गीता धाकड़ जय दूल्हा देव बाबा स्वसहायता समूह की अध्यक्ष हैं। समूह से जुड़ने से पहले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी। उनके पति मजदूरी करते थे और गीता बाई स्वयं एक छोटी सी किराना दुकान संचालित करती थीं। परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं।

पति की मजदूरी और किराना दुकान से होने वाली सीमित आमदनी से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल से हो पाता था। आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें साहूकार से कर्ज लेना पड़ता था। आय सीमित होने के कारण साहूकार के कर्ज का ब्याज चुकाना भी कठिन होता था और मूल राशि कम नहीं हो पा रही थी। इससे परिवार पर आर्थिक दबाव बना रहता था।

श्रीमती गीता बाई बताती हैं कि जब वह स्वसहायता समूह से जुड़ीं, तब उन्हें समूह की गतिविधियों के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। प्रारंभ में समूह की बैठकों में अपनी बात रखने में उन्हें झिझक महसूस होती थी, लेकिन नियमित बैठकों में शामिल होने से धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ा। उन्होंने समूह की बचत, ऋण एवं लेन-देन की प्रक्रिया को समझा और स्वयं भी बचत करना शुरू किया।

समय के साथ उन्होंने आर्थिक मामलों को समझना शुरू किया और परिवार के निर्णयों में भी अपनी भागीदारी बढ़ाई। समूह से जुड़ने के बाद गीता बाई ने सबसे पहले अपनी किराना दुकान को बढ़ाने के लिए समूह से ऋण लिया। ऋण से दुकान में आवश्यक सामान बढ़ाया, जिससे दुकान की बिक्री और आमदनी में वृद्धि होने लगी। उन्होंने नियमित रूप से ऋण की किस्तें चुकाईं और निर्धारित समय में पूरा ऋण चुका दिया।

इसके बाद परिवार की आय को और बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने आटा चक्की लगाने का निर्णय लिया। समूह की बैठक में इस संबंध में चर्चा की और सदस्यों की सहमति से समूह से ऋण लेकर ग्राम में आटा चक्की स्थापित की।

आटा चक्की शुरू होने के बाद गांव में ही लोगों को आटा पिसवाने की सुविधा मिलने लगी और श्रीमती गीता बाई के परिवार की आय में भी बढ़ोतरी हुई। उन्होंने आटा चक्की से होने वाली आमदनी से समूह का ऋण भी धीरे-धीरे चुकाना शुरू कर दिया। आज उनकी किराना दुकान और आटा चक्की दोनों संचालित हो रही हैं, जिससे उन्हें लगभग 12 हजार 500 रुपये प्रतिमाह की आय प्राप्त हो रही है।

श्रीमती गीता बाई कहती हैं कि स्वसहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां परिवार की जरूरतों के लिए साहूकार से कर्ज लेना पड़ता था, वहीं अब वह अपनी आजीविका गतिविधियों के माध्यम से परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं। समूह ने उन्हें केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं दिया, बल्कि आत्मविश्वास और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता भी प्रदान की है।

आज उनका परिवार साहूकार के कर्ज से मुक्त होकर अपनी आजीविका को निरंतर आगे बढ़ा रहा है और श्रीमती गीता बाई अन्य महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भरता की प्रेरणा बन रही हैं।